सुन्दर सपनाके सुन्दर भावना “जेउनास”


आझ गजल उर्दू–हिन्दी–नेपाली हुइटी थारू लगायत विभिन्न भाषा–भाषीमे फैलल् बा । आरबी–फरसी साहित्यिक भूमिमे गजल निःसन्देश प्रेमप्रणयके गर्भसे जल्मलक हो । मुले, काल्हिक नन्हें आझुक गजल सिर्जनाके विषयवस्तु प्रेमप्रणयमे किल सीमित नै हो । आझके गजलमे समय, देशप्रेम, राष्ट्रियता, कला, संस्कृति, पहिचान, मौलिकता, जीवन ओ दर्शनके मेरमेरिक आयाम मूख्य विषयवस्तु मानजाइठ् ।

२०६० के दशक सिर्जनाके हिसाबसे थारू साहित्यिक फँटवामे गजलके दबदबा रहल् । ०७० के दशकके शुरुवाटसंगे मुक्तकके प्रभाव फेन ओत्रे बिल्गाइठ् । नेपाली साहित्यके माध्यमिककालमे मोतीराम भट्टैसे गजलके बिया लगैलक प्रसंग फेन स्मरणीय बा । नम्मा समयसम चर्चा ओ चासोसे बाहेर रहल् नेपाली गजल छत्तिस सालके सडक कविता–क्रान्तिसंगे फेन लावा लौझी निक्रल् बिल्गाइल् । चालिसके आरम्भमे कृतिगत अनुहार लेके आइल् ओस्टक विकसित ओ विस्तार फेन हुइल् । मुले थारू भाषाके साहित्यिक फँटवामे गजल बहुत पाछेसे पैंठल् ।

जौन जिम्मेवारीबोध ओ सामाजिक परिवर्तनसे फेन सस्ता भावुकतामे यौन चाहना, निराशावादी चिन्तन, वास्ताविक जीवनसे विलय ओ बहुट दुर्घटनाके शिकार बन्नओर प्रेरित करठ् । उहेसे विषयवस्तु छनौटमे कुछ कमीकमजोरी जरुर बा ओ गजलकार लोग स्वयम सचेत हुइना फेन जरुरी बा ।

पचासके दशकमे छिट्फुट पत्रपत्रिकामे विल्गैलेसे फेन कृतिगत अनुहार २०५७ सालमे किल बिल्गाइल् । कैलालीके जोखन रत्गैयाँक ‘चोराइल मन’ पहिल गजल संग्रहके रुपमे मानजाइठ् । ओसिक टे ‘चोराइल् मन’ आझ दुर्लभ अवस्थामे बा । किताबके लेखक जोखन रत्गैयाँक सेनाके फौजी कार्वाहीमे शहादत हुइल् पाछे हुँकार कृति सजोग लगाइ नै सेक्लक अवस्था बा । ओकर पाछे २०६१ सालमे भुवन भाइक ‘आछट्’, लक्की चौधरीक् ‘सहिदान’ ओ छविलाल कोपिलाके ‘भौगर’ कैके अक्के बरसमे तीनठो संग्रह निकरल् । आझ थारू भाषामे करिब दुई दर्जन गजल संग्रह प्रकाशित हुइल बिल्गाइठ् ।

असिके थारू गजलके इतिहास हेरेबेर जम्मा डेढ दशक किल हुइल् बिल्गाइठ् ओ यी समयावधिमे गजल सिर्जनाके भारी विकास ओ विस्तार हुइलक फेन लिरौसीसे अनुमान लगाइ सेक्जाइठ् । साहित्यिक पत्र–पत्रिका, रेडियो तथा साहित्यिक गोष्ठीमे गजल नैरहलक कौनो फेन कार्यक्रम मुस्किलसे मिली । पछिल्का समयमे कृतिकारके रुपमा फेन सार्वजनिक हुइटी आइल् बा । यद्यपि बाहर अ‍ैलक गजल संख्यात्मक रुपमा आशातीत् रहलेसे फेन गुणस्तरीयताके हिसाबमे कमजोर बा । अधिकांश सिर्जनाकारलोग गजल रहरमे लिख्न, सुनल् भरमे लिख्न, डेखल् भरमे लिख्न, अनुमानके भरमे किल लिख्न प्रचल ढेर बा ।

गजल लेखनमे यी प्राविधिक अध्ययन नै कैके ज्ञानके कमी ओ साधनाके अभावके कारण यी समस्या देखा पर्लक हो । ढेर जन्हुनमे कफिया ओ रदिफ मिल्लेसे गजल हुइना अथवा तुक (अनुप्रास) मिल्लेसे गजल मन्न गलत मनोविज्ञान फेन बा । भाव गाम्भीर्यताहे ओत्र ख्याल् नै कैके तुकबन्दी सिर्जनाहे जबरजस्त गजलके दायराभित्तर घुसैना दुष्प्रयाससे गजलमे विकृति अ‍ैलक होे । संरचनागत सैद्धान्तिक (बाह्य ओ आन्तरिक तत्व) ज्ञान बिना गजल असम्भव बा । गजल लिखक लग यकर गहींर अध्ययन कैना जरुरी बा ।

मुले, हमार समुदायमे अध्ययन संस्कृतिके विकास फेन कम बा । यिहे कारणसे आझ आपनहे स्वघोषित गजलकारलोग जबरजस्त रुपमे गजलके नाउँमे गैरगजल फेन लिख्टी बटाँ ओ गजल लेखनमे विकृति फैलटी बा । थारू भाषाके गजलमे डेखपरल यी गम्भीर समस्या हो । गजल लिखक लग सौन्दर्यचेतना ओ विषयवस्तु छनौटसंगे भाव गाम्भीर्यतामे ध्यान देना जरुरी रहठ् ।

आझ देशहे मुटुमे धैके विदेशी भूमिमे रगत चुहाके जीवन गुजर्टी रहल कुछ थारू ठँरिवन आपन सिर्जनशील हाँठसे ‘जेउनास’ गजल संग्रहके माध्यमसे देशके चिन्ता कैटी बटाँ । यी संग्रहमे आपन अमूल्य सिर्जनाके परोसन देहुइया १० ठो स्रष्टा लोग बटाँ । जेकर अलग पहिचान, अलग विशेषता ओ अलग सिर्जनशैली बा । हो, यिहे विविधता भित्तर सुन्दर जीवन, कला, संस्कृति ओ प्रेमके सुन्दर गहना सौप्टी बटाँ । हेरी संग्रहके एक स्रष्टा रामचन्द्र चौधरीक् एकठो गजलके शेर :

जातीयताके नाही, समानताके नारा हुइ परी
शोषक ओ सामन्ती नही सर्वहारा हुइ परी
पुरुव मेची पच्छिउँ महाकालीसम रहल सक्कु
नेपाली, नेपालीनबीच भाइचारा हुइ परी

यी सुन्दर सिर्जनाभावमे जातीय अहंकारवाद त्यागके शान्तिप्रतिके आशा, देशमे रहल् भ्रष्टाचार, अन्याय, अत्याचार, शोषण, दमनप्रतिके वितृष्णा, आपन जिम्मेवारीबोध ओ नेपालके रहल विभिन्न जातजातिके सुन्दर माला गुँठके एक आपसमे सदभावके चाहनाके गम्भीर अभिव्यक्ति प्रस्तुत कैले बटाँ । हमार मनमे फेन सकारात्मक सोचके विकास हुइना जरुरी बा । नेपालमे बैठुइया हम्रे सक्कु जाने नेपाली हुई ।

आझ देशहे मुटुमे धैके विदेशी भूमिमे रगत चुहाके जीवन गुजर्टी रहल कुछ थारू ठँरिवन आपन सिर्जनशील हाँठसे ‘जेउनास’ गजल संग्रहके माध्यमसे देशके चिन्ता कैटी बटाँ । यी संग्रहमे आपन अमूल्य सिर्जनाके परोसन देहुइया १० ठो स्रष्टा लोग बटाँ ।

सक्हुनके आपन चाहना बा, पहिचान बा, आपन छुट्टे कला–संस्कृति बा । एकापसमे बैठके यी देशके महोल सौहाद्र्रता हुइपर्ना सुन्दर कल्पना यी गजलके भावमे बा । देशमे अब्बे अतिजातीयता अहंकारके दबदबा बा । जिहीसे देश, समाज पुरे दब्बुपनसे गुजर्टी रहल समयमे रामचन्द्रके यी गजल सकारात्मक आशाके सन्देश डेहठ् । ओस्टक डोसर गजलकार लाछुराम दंगौराक शेर हेरी :

पियर लुग्रा ओहरके, गीत भजन गउइया हुँक्रे
ढेर मिल्ठै अ‍ैसिन गाउघर जाने ठगुइया हुँक्रे
मनैं हेरके भिख मग्ठैं, कौनो द्यौठानके नाउँ लै लै
थारू गाउँकिल पेल्ठै माथेम भुवा घसुइया हुँक्रे

आझ समय २१औं शताब्दीमे टेकसेक्ले बा मने मनैं १२औं–१३औं शताब्दीके स्वभाव डेखाके थारू जातिनहे ठग्टी अ‍ैलक यर्थाथ भाव आपन गजलके शेरमे गुँठ्ले बटाँ । धर्मके नाउँमे पियर लुग्गाधारी लोग विभिन्न प्रलोभनमे फँसाके शोषण ओ लूट मचैटी बटाँ, मेरमेरिक भ्रम ओ त्रास देखाके सर्वस्व लुट्ना फटहनसे समयमे सौंकेर रहना जोडदार अभिव्यक्ति बा यी गजलके शेरमे । प्रकृति पूजक थारु जात आपन मौलिक देवी–द्यौटामे आस्था कैना समुदाय हुइट । यी जात ठग, लबार करे नै जन्ना जात हुइलक ओरसे हिन्दू पाण्डा लोग यइनहे लिरौसीसे जालमे परके उठीबास हुइलक कैयो घटना फेन बा । मुले थारू अभिन फेन सचेत हुइ नै सेक्लक दुःख व्यक्त कैटी आब समयमे सचेत रहना खबरदारी कैले बटाँ ।

दोसर गजलकार राम पछल्डंग्याके हृदामे देश ओ आपन भूमिके मैयाँ बटिन् । सपनामे देशके उननति, प्रगति बटिन ओ देशद्रोही दलाल लोगहे देशसे निकाला कैना, खडेर्ना संकल्प फेन बटिन । हुँकार सिर्जनामे देशके विकास, शान्तिप्रतिके चाहना ओ सक्कु जात, धर्म, समुदायके लग समान व्यवहार हुइना संविधान बने पर्ना आशय बोकल गजलके शेर यी मेर बटिन् :

मेचीसे महाकाली सम्मक सीमाना रखिना बाट
सुन्दर शान्तिक देश हमार नेपाल बचिना बाट
हातम हात मिलाख स्वाभिमानी नेपाली हम्र
देशद्रोही दलाल हुक्कन नेपालसे भगिना बाट ।

ओस्टक तुलाराम सनमके आपन गजलमे कला, संस्कृतिप्रति चिन्ता कैले बटाँ । समयसंगे गाउँमे धान कुटना ढेंकी हेराके मानवीय स्वास्थ्यप्रति असर पर्टीगैलक ओरसे चिन्ता व्यक्त कैटी अभिन फेन ढेंकी रहेपर्ना महसुस कैले बटाँ । ओस्टक नन्हें गाउँघरमे आपन पुर्खा पुरनियनसंगे बैठके सुन्न, बट्कोही, अर्कोसा, उखान टुक्का, गीतबाँस फेन हेरैलकमे चिन्ता व्यक्त कैले बटाँ ।

पुरखा पुरन्या हमार हुक्का फे हेराई लागल
धान कुट्ना ढेकिक चुक्का फे हेराई लागल ।
बरे बरे खिसा हमार मुखग्रे कहे सेक्ना
थारुनके उखान टुक्का फे हेराई लागल ।।

अस्टके बुद्धि चौधरी फेन आपन कला, संस्कृतिके चिन्ता कैले बटाँ कलेसे संगे आपन पहिचान, मौलिक द्यौटा ओ संविधानके चिन्ता बटिन् ।

हमार अस्तित्व, हमार पहिचान म बा
कला, संस्कृति झल्कैना गान बजान म बा
मेरमेरके सीप, ज्ञान रहल हमार समाज
मैगर गीतबाँस, बट्कोही उखान म बा

बर्दियाके सुरज बर्दियाली आपन गजलमे गाउँ छोरके बाध्यताबश विदेशी भूमिमे आपन खून पस्ना चुहैलेसे फेन आपन जिम्मेवारीबोध प्रकट कैले बटाँ । विदेशमे श्रम बेंचके हुइलेसे फेन आपन एक सुन्दर घरके सपना, मोटर साइकलमे सयर ओ जीवनके खुशीक गीत गैना रंगीन आकांक्ष प्रकाट कैले बटाँ । जौन यी मेरके बटिन् ।

बाध्यताले प्रदेश बाटुँ अ‍ैबुँ कठुँ कौनो दिन
चाहना छान्ही म्वार घर छैबुँ कठुँ कौनो दिन
टुट्ली झोंपरिया देखी, मन रुइठ कठी म्वार डाइ,
बनाख सुग्घर महलमे सुटैबुँ कठुँ कौनो दिन

अस्टके सेवेन्द्र कुसुम्ह्यिाँ थारू जातिनके पहिला ट्यूहार गुर्हीहे विषयवस्तु बनाके बालापनके याद कैले बटाँ । जहाँ थारू जातिनके मौतिकता झल्कट् । जौन यी मेरके बा :

हमार ट्यूहार आइटा गुर्ही अस्रैना ।।
केराक बोङगा लठ्ठीसे गर्ही ठठैना ।।
+ + +
टठियाभर भूजा–गुडा मकै केराउ लेक ।।
रंगीबिरंगी चिर्कटीक गुर्ही–गुर्हा उरैना ।।

यहोर कुमार चौधरीक गजलमे भूमिपुत्र थारू जातिने दुर्दशाके बारे अभिव्यक्ति असिक डेले बटाँ :

आझ फे थारूनक बैस्ना वस्ती बेहाल डेक्ठुँ
न स्कूल न सुविधा युक्त अस्पताल डेक्ठुँ
रात दिन परिश्रम कर्ख फे थारूनक घरम
बरसभर खाय नि पुग्ना अनिकाल डेक्ठुँ ।

ओस्टहेक एमके कुसुम्हियाँ फेन जिम्दारिनसे सटवा पैलक विगत समझके आपन गाउँ–ठाउँप्रतिके वितृष्ण व्यक्त कैले बटाँ । कौनो जुग रहे कमैयाँ पशुहस जीवन जिटी रहिँट् । रात दिन पस्ना चुहाके फेन साँझ बिहान खाई नै पुग्न दर्दनाक अवस्था रहिन् । हो, उहे विगतहे बहुट सुन्दरढंगसे यहाँ आपन गजलमे प्रस्तुत कैले बटाँ :

जिम्दरोसे लिहेल रिन सम्झठु त जैनास् निलागत घर
भाखा धरल महिना दिन सम्झठु त जैनास् निलागत घर
जत्रा कमाई हुइल सक्कू साउ ब्याज म जोर्ना ठिक्क बा
भत्कल घरक चुनाहा टिन सम्झठुँ त जैनास् निलागत घर

अनुराग सायर आपन गजलमे बहुत कलात्मक ढंगसे प्रणय भाव प्रस्तुत कैले बटाँ । छोट–छोट विम्वहे बरा गम्भीरसे भावहे कलात्मक वर्णन कैले बटाँ । जौन यी संग्रहके प्रतिनिधि श्रंगारिक गजल मध्यके एक उत्कृष्ट गजल हो ।

जूर पानी प्यास मेटैना एकठो जरुवा हुइक परी
जरुवक पानी पिवैना माटीक करुवा हुइक परी
कोई तो हुइही अनुरागके राजकुमारी सजल
हुकहिन भगैना बैपंखी घोरुवा हुइक परी ।

आझ श्रंगारिक लेखनके नाउँ अस्वभाविक शब्द बौछारसे मनैनहे कामूक, यौन उत्तेजित अथवा अश्लिल बनैना दुश्प्रयास फेन हुइटी बा । जौन उप्पर उल्लेखित सायरके गजलसे उट्पट्याङ श्रृंगारिक सिर्जनाहे बहर्‍या झापट डेले बा । हरेक लेखन मर्यादित हुइना चाही । जौन सक्कु समाज, समुदाय या सक्कु उमेर समुह ओ परिवार भित्तर लिरौसी पचाई सेक्ना चाही । सिर्जनधर्मी लोग जहिया फेन सौहाद्र्रता ओ सदभाव कायम कैना डग्गर ओर केन्द्रित हुइना चाही ओ हरेक सिर्जना बहुआयामिक ओ बहुपक्षीय हुइना चाही ।

जौन सक्कु समाज, समुदाय या सक्कु उमेर समुह ओ परिवार भित्तर लिरौसी पचाई सेक्ना चाही । सिर्जनधर्मी लोग जहिया फेन सौहाद्र्रता ओ सदभाव कायम कैना डग्गर ओर केन्द्रित हुइना चाही ओ हरेक सिर्जना बहुआयामिक ओ बहुपक्षीय हुइना चाही ।

विदेशी भूमिहे आपन कर्मथलो बनाके फेन सिर्जनाक्षमता ढैना यी १० गजलकारलोगनके यी संयुक्त गजल संग्रह हो ‘जेउनास’ । यम्हें कला, संस्कृति, मानवीय जीवनशैली, अव्यवस्था, सामाजिक उत्पीडन, दुःख, पीडा, देशप्रेम, प्रेमप्रणय लगाके विषयवस्तुमे केन्द्रित करिब एक सयठो गजल समावेश कैल बा । यी देशके अवस्था, विदेशी भूमिमे नेपालीनके दुर्दशा, सामाजिक अवस्था, उमेर समुहमे आइल परिवर्तन ओ समयके उतार–चढावहे पारदर्शी रुपमे चित्रण कैले बा ।

यिहे ओरसे यम्हेंक कुछ गजल भौतिक परिर्वतन, सामाजिक सदभाव, मानव जीवनके उन्नयनके सकारात्मक सन्देश डेनामे सफल हुइना बिल्गाइठ् कलेसे कुछ गजलके शेर अतिश्रृंगारिक भावमा फेन लिखल बा । जौन जिम्मेवारीबोध ओ सामाजिक परिवर्तनसे फेन सस्ता भावुकतामे यौन चाहना, निराशावादी चिन्तन, वास्ताविक जीवनसे विलय ओ बहुट दुर्घटनाके शिकार बन्नओर प्रेरित करठ् । उहेसे विषयवस्तु छनौटमे कुछ कमीकमजोरी जरुर बा ओ गजलकार लोग स्वयम सचेत हुइना फेन जरुरी बा ।

यस संग्रहमे संग्रहित गजल हेरेबेर कौनो फेन गजल शास्त्रीय संरचनामे सिर्जित नै हो । सक्कुहस गजल स्वनिर्मित लयमे सिर्जना हुइल गजल बा । समयसंगै सक्कु पराम्परागत शैलीमे लिखिही परठ कना फेन नै हो । सायद यी संग्रहके सक्कु गजलकारलोग स्वर्निमित लय छनौट कैलक हुइट् कना अनुमान लगाई सेक्जाइठ् । कुछ गजल आक्षरिक लयविधानमे बा यद्यपि ऊ फेन सक्कु गजलमे एक रुपता नै बिल्गाइठ । कलेसे अन्य गजलमे लयभङ्गके अवस्था फेन बिल्गाइठ् । मुले, कफिया छनौट ओ प्रयोगमे भर सक्कु जाने सचेत बिल्गैठाँ ।

ठोरचे पूर्ण ओ ढेर आंशिक काफिया प्रयोग हुइल यी संग्रहमे अक्केठो गजलमे एकाक्षरी काफिया प्रयोग हुइल बा । तखल्लुस प्रयोगमे कम ध्यान पुगल बिल्गाइठ् । ओसिक टे यी संग्रहमे गजलके विधागत शास्त्रीयता ओ सैद्धान्तिक संरचना हेर्ना हो कलेसे ढेर कमीकमेजोरी बोठ्कोरे सेक्जाई मुले सक्कु बात यहाँ उल्लेख कैनासे फेन कुछ जिम्मेवारी पाठक लोगमे सौंप्लेसे साइट् न्याय संगत हुइ कना लागल् । उहेसे यकर उचाई ओ समग्रता नप्न जिम्मा फेन पाठक लागनमे छोरटुँ ।

अन्त्यमे थारु भाषाके यी साहित्यिक फँटवामे एक परगा आगे लैजैना गेंहमे रहल् सक्कु जन्हुनहे बधाई ओ सफलताके शुभकामना देना मन लागल् । ओस्टक यी सराह्नीय कामके लग जोखिम उठैलक जंग्रार साहित्यिक बखेरी मुम्बई शाखा ओ जंग्रार साहित्यिक बखेरी प्रधान कार्यालय नेपालगंजहे फेन साधुवाद सौंपक मन लागल् । ओ जैटी–जैटी यत्रे कहक चाहटुँ :

सक्हुनके नजरमे हेरी, यी अक्षर करिया हो
लकिन चिखी, यिहे खँरिया ओ बरिया हो
सोना–चाँदी, हिरा–मोती, धनसम्पत टे का
सोराश्रृंगार यिहे शब्दहार लँह्गा–फरिया हो ।

 क्याटेगोरीः थारु