डोसर संबिधान सभा ओ थरुहट प्रदेश


संबिधान सभाके मौतके मूल कारण राज्यके पुनर्संरचना

सकहुन जानकारी हुइल बात हो कि पहिल संबिधान सभाके मौतके मूल कारण राज्यके पुनर्संरचना हो, संघीय शासन प्रणाली हो । मौतके मूल कारक तत्व, हत्यारा कलेक हालके भारी दलः नेपाली काँग्रेस ओ नेकपा एमाले होइँ । उ कामके अदृश्य सहयोगी एमाओवादी ओ मधेशी सम्बद्ध दल होइँ । यद्यपि अदृश्य सहयोगीन्के भूमिकाहे कतिपय मनै अब्बे स्वीकर्ना पक्षमे नाइ होइँ । यी बात स्वाभाविक फे हो । प्रत्यक्ष भूमिका निर्वाह करुइयन सबकोई डेखठ, अप्रत्यक्ष भूमिका निर्वाह करुइयन उपर नजर कमे परठ ।

संबिधान सभाके तीतमीठ पक्षके मूल्यांकन कर्टी, कमीकमजोरीहे सुधार कर्टी यदि आघे बह्रना, आन्दोलन कर्ना कोई हिम्मत करी कलेसे पहिचानसहितके संघीय शासन ब्यबस्था कायम हुइसेकी, थरुहट, लिम्बुवान लगायत प्रदेश बनेसेकी ।

राज्यके पुनर्संरचनाके जब–जब सवाल उठठ, टब–टब सामन्तवाद थर्रा उठठ् । खैलेक बानी, लहैलेक घटुवा, हाल्हल नाइछुटठ कहठैं । सामन्तहुक्रनके हालत उहे बा । राज्यके पुनर्संरचना हुइना चाही । देशमे ऐतिहासिक पहिचानके आधारमे लिम्बुवान, खम्बुवान, तमुवान, मगरात, थरुहट।थारुवान बन्ना चाही कहटी कि ओइनके मन मष्तिष्क रिगरिग–रिगरिग घुमे लग्ठिन । ओइने कहे लग्ठैं– कि हमार का हुई ? ओइने तुरुन्त, उ सीधासाधा, मुहदुब्बर, बिचारबिहिन बपुरनके बिचमे हड्डी फेंके लग्ठैं कि यी हक कुछ जातहे किल राज्य मिली तो आउर जात का करहीं ? यिहाँ तो सौसे ढेर जात ओ बयानब्बेसे ढेर भाषाभाषी बाटैं । बिचारबिहिन बिश्लेषण नाइकरे सेक्ना, सही गलत नाई छुट्याइ सेक्ना बपुरन लागठ, बात टो ठिके कहटैं कहके । यिहे अज्ञानताबश उत्पीडित जातिहुक्रे हजारौंहजार बरस अन्याय ओ अत्याचारके चकियामे पिसाजाइटैं । मने मतिके गतिमे खासे प्रगति अब्बे फे नाइहो । अबस्था आउर फे खतरनाक होगिल बा । काजे कि काँग्रेस ओ एमालेक् कार्तिक १७ गते नानल ७ प्रदेशके खाकामे पहिचानसहितके प्रदेशके कौनो गुञ्जायश नैहो ।

ग्यारा बरस सशस्त्र युद्ध करल, अन्याय ओ अत्याचारके बिरोधमे बिगुल फुकल एमाओवादी पार्टी पहिल संबिधान सभामे सबसे भारी बनके रहल अवस्था, अन्याय ओ अत्याचारसे थिलथिल हुके काँग्रेस, एमालेहे लत्याके अलगे हुके देशके चौथा शक्तिमे रहल मधेशी दल, जब पहिल संबिधान सभामार्फत राज्यके पुनर्संरचना कराई नाइ सेक्नै कलेसे अब्बे कराई सेक्हीं ? चाहलअसक संघीय शासन ब्यबस्थामे लाने सेकही ? ढेर मनैन्के मन मष्तिष्कमे यी सवाल घर बनाके बैठल बा । सवाल स्वाभाविक फे बा । निश्चय फे काँग्रेस ओ एमाले राज्यपुनर्संरचना सहितके संघीय शासनके बिरोधी होइँ । ओइने जो थरुहट। थारुवान लगायतके संघीय प्रदेशके बिरोधमे आवाज उठैनै ओ अन्तमे पहिल संबिधान सभाके मौत हुइलक हो । मने हत्यामे संलग्न टो तात्कालिन प्रम बाबुराम रहैं, एमाओवादी रहैं ओ मधेशी दल फैं रहैं, यी फे सत्य हो । जेठ १४ गतेक रात, जौन दिन संबिधान सभाके हत्या हुइल, सरकारमे के के रहे ? उ समय सरकारमे रहल दल हमरे चोखा बाटी, हत्याके अभियोग नालगाऊ कहे मिली ? पहिल संबिधान सभामे दबदबा रहल समय, राज्यके पुनर्संरचनाके सवालहे संबिधान सभामे प्रक्रियामे नाई आने सेक्ना, जुनी गिरल, शक्ति ओराइल समय नश टानके बल कर्ना कलेक बाम भगाके पुस्ता सँवरना काम हो । एमाओवादी ओ मधेशी सम्बद्ध दलसे अब्बे यिहे हुइटा । संघीय समाजवादी दल ओ थरुहट तराई पार्टीक अवस्था झन दयनीय बा । लिम्बुवान, खम्बुवान जैसिन संबिधान सभामे प्रतिनिधित्व नै नाइकरे सेकल संगठनके बाटे छोरडी, अइसेबेर हल्लाखल्ला, काम पर्लेसे सुनसान । अन्यथा नालागे, यथार्थ यिहे हो ।

२०७० अगहन ४ गतेक संबिधान सभाके चुनावहे उत्पीडित जाति, बर्ग अपन पक्षमे पारे नाइसेक्ना, जनतनहे सम्झाई बुझाई नाई सेक्ना कलेक पहिचान पक्षधरके भारी कमजोरी हो । माओवादी, मधेशीदल, थरुहट तराई पार्टीके टूटफुट ओ आपसमे चुनावी तालमेल मिलाई नाइसेक्ना फे ओइनके हारके भारी कारण हो । बैश चरहल समय अपने सबसे सुग्घुर कहेहस, चुनाव लागल समय अपने दल सबसे मजा, सबसे मजबुत रहल भान पर्ना स्वाभाविक फे हो । मने बिचार करे पर्ना का रहे कलेसे यी संबिधानसभाके चुनाव हो, हट्ना नाई चाही । जितना हो कलेसे पहिचान पक्षधर मिलना चाहि । मने सम्भवना नाइहुइल । चुनाव परिणामके बाद, अब्बे सकहुन पछतावा टो बा, मने खुलके स्वीकारे कोइ नाई सेकही, कमजोरी यिहे बा ।

निश्चय फे काँग्रेस, एमाले अब्बे पुरान अबस्थामे पुगल बाटैं । देशमे फेनो से भारी दलके रुपमे उभरगिल बाटैं । मनमे फेनो पुराने सोच उमर रहल बाटिन् । मुट्ठी भरके जनताके संज्ञा पाइल एमाओवादी कमजोर हुपुगल बाटैं, सत्य बात यिहे हो । मधेशी दल ब्यक्तिगत स्वार्थके कारण धुजा–धुजा हुइल बात फे यथार्थ हो । मने यी बात फे यथार्थ हो कि एमाओवादी, निरन्तर ग्यार बरस सशस्त्र युद्ध चलाके, देशमे किल तवाही नाई मचैले रहे, सारा संसारके ध्यानफे आकर्षित कर्ले रहे । मधेशी दल, थरुहट संयुक्त संघर्ष समिति फे आन्दोलनमार्फत देशहे हिलासेकल अवस्थाहो । ओ अब्बे फेनसे पहिचानपक्षधर दलहुक्रे जुरमुरारहल अबस्था फे हो । चुनाव उसर्लेक १० महिनाबाद ककस जन्मना कलेक पहिचानपक्षधर संगठनके मजा पक्षहो । आम उत्पीडित जनता फे यिहीसे खुशी बाटैं । मने हाँठी आइल, हाँठी आइल फुस्सा भर नाहोए । २०७० चैत ११ गते आइल संबिधानसभा निर्वाचन बिधेयक २०७०, जे थारुनहे मधेशी बनाइल, बिरोध नाई हुइसेकल । प्रस्तावक साहब प्रस्ताव फिर्ता लैलेनै । बहुतभारी दुःखके बात हुइलबा ।

अन्तमे अब्बे अट्रै कहे सेकजाई कि जस्टे–जस्टे माघ आइटा, ओस्टे–ओस्टे पहिचान पक्षधर जुर्मुराइटै, यी मजा पक्षहो । संबिधान सभाके तीतमीठ पक्षके मूल्यांकन कर्टी, कमीकमजोरीहे सुधार कर्टी यदि आघे बह्रना, आन्दोलन कर्ना कोई हिम्मत करी कलेसे पहिचानसहितके संघीय शासन ब्यबस्था कायम हुइसेकी, थरुहट, लिम्बुवान लगायत प्रदेश बनेसेकी । २२ दल मार्फत प्रचण्ड पाँचथरसे काँग्रेस ओ एमालेक् नानल ७ प्रदेशके खाका नैमन्ना कैहके हुँकार कैरख्लाँ । हेरी आगे तमासा का का डेख्जाइठ ।

साभारः २१ कार्तिक, गोरखापत्र
सौजन्यः कृष्णराज सर्वहारी ।

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